*जशपुर के राजसी दशहरा महोत्सव में आज भी कायम हैं प्राचीन परम्पराएं* *जानिए जशपुर राजसी दशहरा की परम्पराएं*

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*जशपुर के राजसी दशहरा महोत्सव में आज भी कायम हैं प्राचीन परम्पराएं*

*लंका और रावन दहन के साथ जशपुर के राजसी दशहरा महोत्सव का हुआ समापन*

*रियासतकाल में भगवान बालाजी को दी जाती थी तोपों की सलामी*

*राजशाही दशहरे में जशपुर राजपरिवार की 27 वीं पीढ़ी हो रही है शामिल*

जशपुरनगर :- मंगलवार 12 अक्टूबर को जशपुर के एतिहासिक रैनीडांड़, अब रणजीता स्टेडियम में रावण वध और लंका दहन के साथ ही जशपुर के राजसी दशहरा महात्सव का समापन हो गया।
इससे पहले मंगलवार को दोपहर विजयादशमी के मौके पर जशपुर स्थित बालाजी मंदिर से भगवान बालाजी को सोलह श्रृंगार कर रथ में बैठाया गया। जिसके बाद शाही सैनिकों के साथ उनकी भव्य रथ यात्रा निकली। उनके दर्शन के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा था। करीब एक किलोमीटर की यात्रा में रथ खींचने के लिए लोगों में होड़ लगी रही।


रणजीता स्टेडियम पंहुचने के बाद भगवान बालाजी का वहां बड़ी संख्या में मौजूद लोगों ने दर्शन कर नीलकंठ का दर्शन किया। भारी भीड़ की उपस्थिति में असत्य पर सत्य के विजय का महापर्व मना और दशानन का दहन हुआ। इससे पहले भगवान बालाजी की रथयात्रा शाम करीब 4 बजे बालाजी मंदिर से निकली। भगवान बालाजी को राज परिवार के सदस्यों ने मंदिर का परिक्रमा कर लकड़ी के रथ में रखा। चांदी के सिंहासन में विराजमान कर एवं पूजा-अर्चना कर शोभा यात्रा प्रारंभ हुई। जैसे ही रथ के आगे बढ़ाने का इशारा हुआ, रथ खींचने के लिए श्रद्धालुओं के बीच होड़ लग गई। इस दौरान भगवान बालाजी के शाही सैनिक शाही परिधान में अस्त्र-शस्त्र, तुरही, चंवर, छत्र के साथ सुसज्जित होकर भगवान की सेवा में उपस्थित थे। भगवान बालाजी के रथ के साथ तीन और रथ थे, जिसमें राज परिवार के सदस्य, आचार्य, पुस्ताकाचार्य एवं राजपुरोहित सवार होकर साथ-साथ चल रहे थे। रथारूढ़ भगवान के दर्शन पाकर श्रद्धालु निहाल हो उठे थे। मंगलवार को सुबह से ही बालाजी मंदिर में भगवान बालाजी की पूजा-अर्चना देखने के लिए गांव-गांव से लोग एकत्रित होने लगे। धीरे-धीरे लोगों की भीड़ बढ़ती गई।


*रथ की जगह-जगह हुई पूजा अर्चना*
भगवान बालाजी जिस रथ में सवार होते हैं, उस रथ को श्रद्धालु पूरी श्रद्धा के साथ खींच  कर अपने आप को भाग्यशाली मानते हैं। भगवान का रथ खीचने के लिए वहां उपस्थित श्रद्धालुओं के बीच होड़ मची थी। रथ यात्रा के दौरान एक किलोमीटर लंबी कतार थी। बालाजी भगवान का रथ मंदिर से रैनीडांड (अब रणजीता मैदान) पहुंचा। इस दौरान लोगों का हुजूम बालाजी भगवान के रथ को खींचने के लिए प्रयास करता रहा। जिन्हेे जहां जगह मिली वहीं से रस्सा पकड़ कर पुण्य के भागी बनते रहे। यह सिलसिला रैनीडांड़ तक चलता रहा। इस दौरान बालाजी मंदिर से जब रथ चलाए तो जगह-जगह शहरवासी आरती और पूजा का थाल सजा कर रथ आने का इंतजार करते रहे।

*जशपुर दशहरा में नीलकंठ उड़ाने की परंपरा*

रथ यात्रा के दौरान मार्ग के दोनो ओर श्रद्धालु भगवान दर्शन के लिए खड़े रहे। यहां यह पंरपरा आज भी बरकरार है जब बालाजी की शाही सवारी निकलती है तो पारंपरिक वाद्ययंत्र सैकड़ो नगाड़े, तुरही, ढोल, मंजीरे की थाप पर लोग पूरे उत्साह से भगवान का भजन एवं जयकारा लगाते झूमते हुए यात्रा रैनीडांड़ तक पहुंची। रैनीडांड़ पहुंचने पर भगवान बालाजी की विधिवत पूजा की गई। इसके बाद नीलकंठ की पूजा परंपरा के अनुसार कर उन्हें उड़ाया गया। नीलकंठ उड़ाने की परंपरा रियासत काल से चली आ रही है। इसके बाद पारंपरिक रूप से बनाई गई लंका में रावण, कुभंकर्ण, मेघनाथ का दहन किया गया। रणजीता मैदान में जशपुर राजपरिवार के सदस्यों व राजपुरोहितों ने अपराजिता पूजन भी किया।

Pathik Jan News
Author: Pathik Jan News

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